Saturday, 26 August 2017

भारतीय गौवंश की महत्ता व् राजनैतिक षड्यंत्र

गोवंश जनगणना क्यों?
टारगेट 2050

प्राचीन काल सतयुग से लेकर 1980 तंक, लाखो साल तक गोवंश उत्पाद जैसे दूध , घी,मक्खन, छाछ , खोवा आदि  हमारे देश में सबसे अधिक लोकप्रिय आहार रहे है।
अंग्रेजो ने गोउत्पाद का प्रयोग भारत के हर घर में देखा।

अंग्रेज हर उस चीज को तुरंत व्यापारिक नजरिये से ग्रहण कर लेते है जिसको हिन्दू उपयोग करते है। *ताकि उसका बाद में उसको  व्यापार कर लाभ कमाया जा सके।* जैसे
टमाटर की चटनी भारत में बहुत खाई जाती थी और है,तो अंग्रेजो ने टोमेटो सास का प्रचलन बाजार में कर दिया।

तो
अंग्रेजो ने गाय का दूध ,घी,खोवा आदि की महिमा जानी और ये समझ गए कि *हिन्दू इनके बिना नहीं रह सकते।*
तो
*अंग्रेजो ने 100 वर्षीय व्यापारिक योजना बनाई*
फिर

1) वर्ष 1991 से देशी गोवंश की जनगणना आरम्भ हुई, ताकि पता लगाया जा सके की भारत्त में जनसंख्या के अनुपात में गाय कितनी है।
*इससे विदेशी कम्पनियो को दूध की कमी मालुम पड़ जाएगी,* यानी नेस्ले दूध पाउडर, क्रीम,  आदि का बाजार बढ़ाने हेतु आंकड़े  सरकारी सर्वे द्वारा उपलब्ध रहेंगे, कम्पनी का कोई खर्च नही।

2) केवल हिन्दू त्योहारों पर ही नकली खोवा पकड़ने के समाच्चार आते है और भैंस ,कुत्ते तक को ढूंढ लाने वाली पुलिस पिछले 20 सालों में नकली खोवे बनाने वालों को नही पकड़ पा रही, क्योंकि *असली खेल तो केवल नकली खोवे के नाम पर वर्तमान में भयभीत बनाये रखना ही है।* ताकि 2050 में असली का व्यापार किया जा सके।

3) अभी अखबारो में,टीवी पर, और आपके डाक्टर बताते है कि *हिरदय,किडनी ,लकवा से बचना है तो घी मत खाओ।*

तो
आपको मालुम है कि असली गाय, उरुग्वे,ब्राजील में प्राकृतिक धुप, जंगल में पाली जा रही है,बंदूकों की सुरक्षा में ,ताकि 1 भी गोवंश का नुकसान ना हो।

अब खेल शुरू हो रहा है धीऱे धीऱे, समझिये ठीक से।
2015 में फ्रांस की एक कम्पनी दक्षिण की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध दूध फैक्ट्री को खरीद लेती है।
यानी पहले चरण में *दक्षिण में मिलने वाले ताजे दूध,घी, मक्खन,छाछ के व्यापार पर विदेशी कब्जा आरम्भ हो चुका।*

तो *आइये वर्ष 2050 में,* जब पुरे देश में जर्सी गाय या भैंस का इंजेक्शन वाला दूध ही उपलब्ध है, और *इस दूध आदि की भरपूर निंदा* 2050 के भारतीय डाक्टर कर रहे है और उसका उपयोग ना करने की सलाह दे रहे है और *आंकड़े बताये जा रहे है कि 2000 से 2050 तंक किंतने लोग गम्भीर रोगों से ग्रस्त होकर मरे इस जर्सी गाय के दूध के कारण।*

फिर 2050 में टीवी पर नेस्ले कम्पनी का विज्ञापन आता है,
*हम आपके स्वास्थ्य की चिंता करते है, हिन्दू धर्म का सम्मान करते है, इसलिये हम लाये है असली देशी गाय का दूध, घी आदि (ब्राजील ,उरुग्वे वाली ), जोकि सूर्य की रौशनी से विटामिन डी युक्त है, विषनाशक, रोगनाशक है।*

और जो डाक्टर *1980 से 2050 तंक आपको घी खाने से मना कर रहे  थे,* वो अब तुरंत विदेशी कम्पनी की भाषा बोलने लगेंगे और कहेंगे कि *देशी गाय का दूध , घी भरपूर  खाओ, ये शरीर के लिये अमृत है क्योंकि देशी गाय का है और 50 साल की रिसर्च द्वारा प्रमाणित हैै कि इससे गम्भीर रोग नही होते।*
और
इस घी की कीमत उस समय होगी 10 हजार रूपये किलो आदि, ठीक उसी तरह जैसे मुफ्त के गवारपठे को एलोवेरा बनाकर विदेशी कम्पनियो ने 1000 रूपये किलो तंक बेचा है, योग को योगा बनाकर बेचा, लहसुन को गार्लिक पर्ल्स बनाकर बेचा, इत्र को आदमी औरत को आकर्षित करने वाला परफ्यूम बनाकर बेचा।

तो 2050 में देशी गाय का दुध, घी, खोवा ,मिठाईयां भरपूर बिकेंगी, डाक्टर आगे बढ़कर इनका सेवन करने को कहेंगे,    केवल विदेशी कम्पनिया ही बेचेगी क्योंकि सरकार क़ानून बनाकर 2050 में जर्सी गाय, भैंस के दूध को प्रतिबंधित कर् देगी ( ढेले वाले नमक की तरह ), और देश में दूध, मिठाई,खोवा पर एकछत्र अधिकार होगा विदेशी कम्पनियो का।( जैसे आयुर्वेद को बदनाम करके या ख़त्म करते हुए, दवाइयों के बाजार पर 80% विदेशी कम्पनियो कब्जा है )

तो

2050 में
सोना संस्ता होगा और देशी गाय का दुध, घी, महंगा होगा ,एकछत्र व्यापारी केवल यूरोप होगा,जैसे अभी कम्प्यूटर मोबाइल पर कब्जा है उनका।

भारतीय विवश होंगे खरीदने को ।

ये है वर्तमान नकली खोवे के मौसमी समाच्चार, आक्सीटोसिज इंजेक्शन,जर्सी गाय को पूरे देश में फैलाये रखने की योजना का योजनाबद्ध इल्लू गीरोह का षड्यंत्र।

अतः आज चेतो और देशी गाय को बचाओ,

Tuesday, 22 August 2017

सोमनाथ मंदिर के कुछ रहस्य

क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े #बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं?

‘इतिहास’ बडा चमत्कारी विषय है। इसको खोजते खोजते हमारा सामना ऐसे स्थिति से होता है, की हम आश्चर्य में पड जाते हैं। पहले हम स्वयं से पूछते हैं, यह कैसे संभव है..?
डेढ़ हजार वर्ष पहले इतना उन्नत और अत्याधुनिक ज्ञान हम भारतीयों के पास था, इस पर विश्वास ही नहीं होता..!
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आकर कुछ ऐसी ही स्थिति होती है। वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है। १२ ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ..! एक वैभवशाली, सुंदर शिवलिंग..!! इतना समृध्द की उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी। अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए। उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए। इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था।

लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है। सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है। विशाल अरब सागर रोज भगवान सोमनाथ के चरण पखारता है। और गत हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है। न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है।

इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है। यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता है। यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है। लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है। उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ होगा। यह एक दिशादर्शक स्तंभ है, जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है। इस बाणस्तंभ पर लिखा है -

‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत
अबाधित ज्योतिरमार्ग..’

इसका अर्थ यह हुआ – ‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है।’ अर्थात ‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है।

जब मैंने पहली बार इस स्तंभ को देखा और यह शिलालेख पढ़ा, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था..? कैसे संभव है.? और यदि यह सच हैं, तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं..!

संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं। इस पंक्ति का सरल अर्थ यह हैं की ‘सोमनाथ मंदिर के उस बिंदु से लेकर दक्षिण धृव तक (अर्थात अंटार्टिका तक), एक सीधी रेखा खिंची जाए तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है'। क्या यह सच है..? आज के इस तंत्रविज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।

गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है, लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ या ‘ज़ूम’ करते हुए आगे जाना पड़ता है। वैसे तो यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम हैं. लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड. उससे छोटा पकड में नहीं आता हैं) नहीं आता है। अर्थात हम मान कर चले की उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है।

किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है। अगर मान कर भी चलते हैं की सन ६०० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था, तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी धृव है, यह ज्ञान हमारे पुरखों के पास कहांसे आया..? अच्छा, दक्षिण धृव ज्ञात था यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण धृव तक सीधी रेषा में एक भी भूखंड नहीं आता है, यह ‘मैपिंग’ किसने किया..? कैसे किया..? सब कुछ अद्भुत..!!

इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है, इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं, पृथ्वी का दक्षिण धृव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था। यह कैसे संभव हुआ..? इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कोई साधन उपलब्ध था..? अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था..?

नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है। अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं.) कहते है। यह प्राचीन शास्त्र है। इसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे। परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है। हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है। इनका कालखंड इसा पूर्व ६११ से ५४६ वर्ष था। किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था, बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इस लिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण धृव दिखने का कोई कारण ही नहीं था।

आज की दुनिया के वास्तविक रूप  के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन १४९० के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता हैं, की कोलंबस ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।

‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था। ‘एनेक्सिमेंडर’ इसा पूर्व ६०० वर्ष, पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था। ‘एरिस्टोटल’ (इसा पूर्व ३८४ – इसा पूर्व ३२२) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।

लेकिन भारत में यह ज्ञान बहुत प्राचीन समय से था, जिसके प्रमाण भी मिलते है। इसी ज्ञान के आधार पर आगे चलकर आर्यभट्ट ने सन ५०० के आस पास इस गोल पृथ्वी का व्यास ४,९६७ योजन हैं (अर्थात नए मापदंडों के अनुसार ३९,९६८ किलोमीटर हैं) यह भी दृढतापूर्वक बताया। आज की अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से पृथ्वी का व्यास ४०,०७५ किलोमीटर माना गया है। इसका अर्थ यह हुआ की आर्यभट्ट के आकलन में मात्र ०.२६% का अंतर आ रहा है, जो नाममात्र है..! लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट के पास यह ज्ञान कहां से आया..?

सन २००८ में जर्मनी के विख्यात इतिहासविद जोसेफ श्वार्ट्सबर्ग ने यह साबित कर दिया की इसा पूर्व दो-ढाई हजार वर्ष, भारत में नकाशा शास्त्र अत्यंत विकसित था। नगर रचना के नक्शे उस समय उपलब्ध तो थे ही, परन्तु नौकायन के लिए आवश्यक नक़्शे भी उपलब्ध थे।

भारत में नौकायन शास्त्र प्राचीन काल से विकसित था। संपूर्ण दक्षिण आशिया में जिस प्रकार से हिन्दू संस्कृति के चिन्ह पग पग पर दिखते हैं, उससे यह ज्ञात होता है की भारत के जहाज पूर्व दिशा में जावा, सुमात्रा, यवद्वीप को पार कर के जापान तक प्रवास कर के आते थे। सन १९५५ में गुजरात के ‘लोथल’ में ढाई हजार वर्ष पूर्व के अवशेष मिले हैं। इसमें भारत के प्रगत नौकायन के अनेक प्रमाण मिलते हैं।

सोमनाथ मंदिर के निर्माण काल में दक्षिण धृव तक दिशादर्शन, उस समय के भारतियों को था यह निश्चित है। लेकिन सबसे महत्वपूर्व प्रश्न सामने आता है की दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में समुद्र में कोई अवरोध नहीं है, ऐसा बाद में खोज निकाला, या दक्षिण धृव से भारत के पश्चिम तट पर, बिना अवरोध के सीधी रेखा जहां मिलती हैं, वहां पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित किया..?

उस बाण स्तंभ पर लिखी गयी उन पंक्तियों में,
(‘आसमुद्रांत दक्षिण धृव पर्यंत, अबाधित ज्योतिरमार्ग..’)
जिसका उल्लेख किया  गया है, वह ‘ज्योतिरमार्ग’ क्या है..?

यह आज भी प्रश्न ही है..!क्योंकि सुदूर दक्षिण में जाने वाले मार्ग का उत्तर काल के थपेड़ों में कहीं लुप्त हो गया है!!

क्यो हमारे पुर्वज पितृपक्ष मे कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे.......?

क्यो हमारे पुर्वज पितृपक्ष मे कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे.......? पीपल ओर बरगद को सनातन धर्म मे पूर्वजों की संज्ञा दी गई ह...